इंसानियत की मिसाल: वह वीर जिसने साहिबजादों को दूध पिलाने के लिए अपना परिवार न्योछावर कर दिया”
भाई मोती राम मेहरा: जिन्होंने मानवता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया
सिख इतिहास के सबसे दुखद और गौरवशाली पन्नों में सरहिंद की घटना स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। जब दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों और माता गुजरी जी को वजीर खान द्वारा ‘ठंडे बुर्ज’ में कैद किया गया था, तब कड़कड़ाती ठंड में उन्हें भूखा-प्यासा रखा गया। ऐसे समय में भाई मोती राम मेहरा जी ने अपनी परवाह न करते हुए उनकी सेवा की।

कौन थे भाई मोती राम मेहरा?
भाई मोती राम मेहरा सरहिंद के किले के भोजनालय में एक रसोइया और सेवक थे। वे गुरु घर के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे। जब उन्हें पता चला कि माता गुजरी जी और साहिबजादों को बिना भोजन और पानी के कैद किया गया है, तो उनका हृदय कांप उठा।
दूध पिलाने की सेवा
वजीर खान का सख्त पहरा था कि कोई भी कैदियों को कुछ खाने-पीने को नहीं देगा। भाई मोती राम मेहरा ने अपनी पत्नी से सलाह की और अपने गहने बेचकर पहरेदारों को रिश्वत दी ताकि वे उन्हें अंदर जाने दें। वे रात के अंधेरे में छिपकर माता जी और साहिबजादों के लिए गरम दूध लेकर पहुँचे।
लगातार तीन रातों तक भाई मोती राम जी ने अपनी जान की बाजी लगाकर साहिबजादों को दूध पिलाया। यह केवल दूध नहीं था, बल्कि वह प्रेम और साहस का प्रतीक था जिसने उन नन्हीं आत्माओं को मुगल साम्राज्य के खिलाफ अडिग रहने की शक्ति दी।
शहादत और बलिदान
जब वजीर खान को इस बात का पता चला कि भाई मोती राम मेहरा ने शाही हुक्म की अवहेलना की है, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। भाई मोती राम जी ने हंसते-हंसते इस क्रूर सजा को स्वीकार किया, लेकिन गुरु के परिवार की सेवा से पीछे नहीं हटे।

आज भी फतेहगढ़ साहिब की धरती भाई मोती राम मेहरा जी के इस महान बलिदान की गवाह है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि मानवता और धर्म की सेवा के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने से पीछे नहीं हटना चाहिए।



